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हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं: अस्पतालों में ठप होती ओपीडी, मरीज बेहाल, सरकार पर बढ़ा दबाव

हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं: अस्पतालों में ठप होती ओपीडी, मरीज बेहाल, सरकार पर बढ़ा दबाव

हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई हैं। आईजीएमसी शिमला में डॉक्टर–मरीज विवाद के बाद एक डॉक्टर के निलंबन/बर्खास्तगी की कार्रवाई से नाराज डॉक्टरों ने प्रदेशभर में हड़ताल का रास्ता अपनाया, जिसका सीधा असर आम मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों की ओपीडी सेवाएं प्रभावित हैं, जांचें टल रही हैं और दूर-दराज़ से आने वाले मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी शिमला, टांडा मेडिकल कॉलेज, नेरचौक, चंबा और हमीरपुर सहित कई जिला अस्पतालों में डॉक्टरों ने काली पट्टी बांधकर काम किया या फिर पूर्ण/आंशिक हड़ताल की। हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं के कारण कई जगह इमरजेंसी सेवाएं तो चालू रखी गईं, लेकिन सामान्य ओपीडी, फॉलोअप और रूटीन सर्जरी पर असर साफ देखा गया। अस्पताल परिसरों में लंबी कतारें और मायूस मरीज इस हालात की गवाही दे रहे हैं।

डॉक्टरों का कहना है कि वे अपने साथी डॉक्टर के खिलाफ की गई कार्रवाई को एकतरफा मानते हैं। एक वरिष्ठ डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “डॉक्टरों पर काम का अत्यधिक दबाव है, संसाधन सीमित हैं और ऐसे में प्रशासन को भी परिस्थितियों को समझना चाहिए।” वहीं दूसरी ओर, मरीज संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि किसी भी हाल में मरीज के साथ मारपीट या अभद्र व्यवहार को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहे असर को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं राज्य सरकार की विफलता को उजागर कर रही हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को पहले ही हालात संभालने चाहिए थे, ताकि हड़ताल की नौबत न आती। वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और किसी को भी नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

मरीजों की परेशानी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू बनकर सामने आई है। कांगड़ा से आई एक महिला मरीज ने कहा, “हम सुबह चार बजे घर से निकले थे, लेकिन यहां आकर पता चला कि डॉक्टर हड़ताल पर हैं। अब न इलाज हो रहा है, न कोई सही जानकारी मिल रही है।” इसी तरह बुजुर्ग और गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को निजी अस्पतालों की महंगी सेवाओं की ओर मजबूर होना पड़ रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि डॉक्टर–मरीज संबंधों में बढ़ता तनाव एक गंभीर सामाजिक समस्या बनता जा रहा है। उनका कहना है कि हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि विश्वास के संकट का संकेत हैं। डॉक्टरों की सुरक्षा, काम के घंटे, संसाधन और मरीजों के सम्मान—इन सभी पहलुओं पर संतुलित नीति की जरूरत है।

सरकार की ओर से संकेत दिए गए हैं कि डॉक्टर संगठनों से बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि मरीजों की सेवाएं बाधित न हों, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जा रही हैं और जल्द ही कोई ठोस निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि जब तक हड़ताल पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक आम जनता को राहत मिलना मुश्किल है।

हिमाचल में डॉक्टरों की हड़ताल और स्वास्थ्य सेवाएं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे सरकारी अस्पताल ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं, और क्या मरीजों के हित सर्वोपरि रखे जा रहे हैं।

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