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भरमौर में अनुसूचित जाति एवं जनजाति विकास निगम के कार्यालय विलय पर उठी तीव्र आपत्ति, स्थानीय प्रतिनिधियों ने कहा – “यह जनजातीय अधिकारों की उपेक्षा है”

भरमौर में अनुसूचित जाति एवं जनजाति विकास निगम के कार्यालय विलय पर उठी तीव्र आपत्ति, स्थानीय प्रतिनिधियों ने कहा - "यह जनजातीय अधिकारों की उपेक्षा है"

भरमौर/चंबा: हिमाचल प्रदेश अनुसूचित जाति एवं जनजाति विकास निगम द्वारा भरमौर स्थित सहायक प्रबंधक (विकास) कार्यालय को जिला चंबा स्थित कार्यालय में विलय करने के आदेश को लेकर स्थानीय प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और युवाओं ने तीखी आपत्ति दर्ज की है।

भरमौर विकास खंड पंचायत समिति सदस्य विक्रम कपूर, जिन्होंने इससे पहले भी यह मुद्दा ADM भरमौर के समक्ष उठाया था, ने अब वार्ड सदस्य अनीश शर्मा, शक्तिव कमेटी अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा, यूथ क्लब अध्यक्ष शिव कुमार, संजय कुमार, श्याम सिंह, सतपाल सिंह, अजय कुमार, विकास कुमार, विजय कुमार, अनिल तथा अन्य स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर एक बार फिर ज्ञापन सौंपते हुए विलय आदेश को निरस्त करने की मांग की है।

📍 प्रस्तावित विलय से क्या होंगी व्यावहारिक समस्याएं?

विरोधकर्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह निर्णय विकासात्मक नहीं, बल्कि जनजातीय क्षेत्र की अनदेखी का प्रतीक है। उनकी प्रमुख आपत्तियां निम्नलिखित हैं:

  1. वित्तीय रूप से कमजोर लाभार्थियों के लिए दूरी एक बाधा
    • विकास निगम की योजनाएं मुख्यतः गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए होती हैं, जिनमें अधिकांश ऋण ₹50,000 से कम के होते हैं।
    • ऐसे लाभार्थियों के लिए चंबा तक बार-बार आना-जाना अत्यधिक खर्चीला है, विशेषकर जब यात्रा पर आने-जाने में अधिक का व्यय हो सकता है।
  2. दस्तावेजों की प्रक्रिया में बढ़ेगा असुविधा का स्तर
    • अक्सर लाभार्थियों को पंचायत स्तर से दस्तावेज दोबारा लाने या सत्यापित करवाने की आवश्यकता होती है। अगर कार्यालय चंबा में होगा, तो प्रत्येक दस्तावेज सुधार या पुनःप्रस्तुति के लिए दोहरा परिवहन खर्च उठाना गरीब वर्ग के लिए संभव नहीं होगा।
  3. स्थानांतरण से सेवाएं जनजातीय क्षेत्र से बाहर चली जाएंगी
    • यह कार्यालय विशेष रूप से जनजातीय उपमंडल भरमौर की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर स्थापित किया गया था। इसका चंबा में विलय इसके मूल उदेश्य से भटकना है, जो वास्तविक लाभार्थियों को सेवाओं से वंचित कर सकता है।

🧾 “₹30,000 के किराए के बहाने से जनजातीय व कमजोर वर्ग के हितों की अनदेखी”

विरोध ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि निगम के प्रबंधन द्वारा दिया गया तर्क कि वर्ष भर में ₹30,000 का किराया वहन कर पाना संभव नहीं, न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि जनजातीय जनता के सम्मान के विपरीत भी है।

जब यह निगम केंद्र सरकार द्वारा आंशिक रूप से वित्तपोषित है, तब इतनी मामूली राशि को आधार बनाकर एक महत्वपूर्ण कार्यालय का विलय प्रशासनिक संकीर्णता को दर्शाता है।

📣 स्थानीय प्रतिनिधियों की स्पष्ट मांग

पंचायत समिति सदस्य विक्रम कपूर ने कहा,
“यह केवल एक कार्यालय का मुद्दा नहीं, बल्कि जनजातीय अधिकारों, पहुंच और गरिमा से जुड़ा विषय है। सरकार को चाहिए कि वह इस आदेश को वापस ले और जनजातीय क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करे।”

शक्तिव कमेटी अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा ने कहा,
“कार्यालय का विलय जनजातीय , अनुसूचित जातियों व कमजोर वर्ग के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण है। “

यूथ क्लब अध्यक्ष शिव कुमार ने जोड़ा,
“गरीब लाभार्थियों के लिए एक छोटे ऋण के लिए भी बार-बार चंबा आना असंभव है। ऐसी व्यवस्था से लोग योजनाओं से वंचित रह जाएंगे।”

🚫 संवैधानिक और नीति स्तर पर चिंताएं

यह निर्णय संविधान की अनुच्छेद 244 और 275 के तहत जनजातीय क्षेत्रों को दिए गए विशेष संरक्षण और पंचायती राज अधिनियम की अनुसूची 5 की भावना के भी विरुद्ध माना जा रहा है। जब जनजातीय उपमंडल के लिए विशेष संस्थागत ढांचे की आवश्यकता हो, तब उसे समाप्त करना विकास की बजाय अधिकारों की कटौती जैसा प्रतीत होता है।