हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर कार्यरत महिला कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) हर महिला कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है और केवल सेवा अनुबंध में इसका उल्लेख न होने के आधार पर किसी महिला को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने ईसीएचएस सेल कसौली में क्लर्क के पद पर कार्यरत रंजना की याचिका पर सुनाया। रंजना ने मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उनके अनुबंध में मातृत्व अवकाश का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
⚖️ कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा-27 के तहत मातृत्व अवकाश एक कानूनी अधिकार है। यह किसी सेवा अनुबंध या विभागीय शर्तों पर निर्भर नहीं करता। गर्भवती महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ देना नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी है।
✅ कोर्ट के निर्देश
- रंजना को मातृत्व अवकाश देने से इनकार करने वाले विभाग के दोनों आदेश रद्द।
- पूरे वेतन के साथ तत्काल मातृत्व अवकाश देने के निर्देश।
- अनुबंध में प्रावधान न होने का तर्क अस्वीकार।
📌 26 सप्ताह तक मिलेगा सवैतनिक अवकाश
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय और ईसीएचएस महानिदेशक द्वारा वर्ष 2019 में जारी दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया। इनके अनुसार नियमित और अनुबंध पर कार्यरत महिला कर्मचारी, यदि उन्होंने किसी वर्ष में कम से कम 80 दिन की सेवा पूरी की है, तो उन्हें अधिकतम 26 सप्ताह का सवैतनिक मातृत्व अवकाश मिल सकता है।
रंजना वर्ष 2014 से लगातार अनुबंध पर सेवाएं दे रही थीं, इसलिए कोर्ट ने उन्हें इस लाभ का पात्र माना।
यह फैसला न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि पूरे देश में अनुबंध पर कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे कार्यस्थलों पर महिलाओं के अधिकार, समानता और सामाजिक सुरक्षा को और मजबूती मिलेगी।
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क्या सभी सरकारी और निजी संस्थानों में अनुबंध पर कार्यरत महिला कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान मातृत्व लाभ मिलना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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