शिमला/भरमौर: डॉ. जनक राज डॉ. जनक राज के प्रयासों से भरमौर के चौरासी मंदिर स्थित पवित्र अर्धगंगा धाम की होगी विशेष जांच, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश भरमौर के ऐतिहासिक चौरासी मंदिर परिसर में स्थित पवित्र तालाब अर्धगया (अर्धगंगा/गुप्तगंगा) के जल की गुणवत्ता को लेकर प्रशासन ने सख्त कदम उठाए हैं। पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन विभाग हिमाचल प्रदेश ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश जारी करते हुए तालाब और आसपास के जलस्रोतों की विशेष वैज्ञानिक जांच तथा स्थल निरीक्षण करने के आदेश दिए हैं। डॉ. जनक राज द्वारा उठाए गए इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि श्रद्धालुओं की आस्था और सार्वजनिक स्वास्थ्य – दोनों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
यह कार्रवाई पांगी-भरमौर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज के अर्द्ध-शासकीय पत्र (D. O. Letter) के आधार पर की जा रही है। पत्र में उन्होंने हालिया जल परीक्षणों का उल्लेख करते हुए बताया कि पवित्र तालाब का पानी पीने योग्य मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है, जिससे विशेषकर मणिमहेश यात्रा और पर्वों के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ सकता है। डॉ. जनक राज ने मांग की थी कि जल की स्थिति का विस्तृत परीक्षण, प्रदूषण के संभावित कारणों की पहचान और त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।



मुख्य सचिव की ओर से जारी पत्र में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को निर्देश दिए गए हैं कि पवित्र तालाब (कुफरी/अर्धगया) सहित आसपास के सभी जलस्रोतों की डिटेल्ड इन्वेस्टिगेशन की जाए, मौके पर जाकर निरीक्षण कर प्रदूषण के कारणों – जैसे अपशिष्ट जल, ठोस कचरा, तीर्थाटन दबाव या संरचनात्मक कारण – की पहचान की जाए और समयबद्ध रिपोर्ट संबंधित विभागों तथा विधायक कार्यालय को सौंपी जाए। प्रशासन ने यह भी संकेत दिए हैं कि रिपोर्ट के आधार पर आवश्यकतानुसार सफाई, उपचार और संरक्षण उपाय लागू किए जाएंगे।
डॉ. जनक राज इससे पहले भी इस विषय पर सक्रिय रहे हैं। उन्होंने जलशक्ति विभाग के कर्मचारियों के माध्यम से तालाब के सैंपल एकत्र कर जांच के लिए भिजवाए थे और तालाब की सफाई भी करवाई थी। उनका कहना है कि आस्था के केंद्रों की स्वच्छता केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का अनिवार्य पक्ष है।
भरमौर का चौरासी मंदिर परिसर हिमाचल ही नहीं, बल्कि देशभर में आस्था का बड़ा केंद्र है। 84 परिसर के पूर्वी कोने में स्थित अर्धगया, जिसे अर्धगंगा और गुप्तगंगा भी कहा जाता है, अपनी क्रिस्टल क्लियर जलधारा के लिए प्रसिद्ध रहा है। मान्यता के अनुसार इसके जल में स्नान करने से पापों का क्षय होता है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश भरमौर में विराजमान थे। माता पार्वती ने गया की फल्गु नदी में स्नान की इच्छा व्यक्त की। दूरी के कारण शिव असमर्थ रहे, तब गणेश ने बाण चलाकर धरती से सात पवित्र धाराओं को प्रकट किया, जिनमें फल्गु और गंगा के समान पुण्यदायी जल समाहित था। इसी कारण अर्धगया में स्नान को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
मणिमहेश यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालु अर्धगया के जल का आचमन और स्नान करते हैं। ऐसे में जल की गुणवत्ता सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित मॉनिटरिंग, स्रोत संरक्षण, नियंत्रित अपशिष्ट प्रबंधन और जागरूकता से ही इस पवित्र धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
