हिमाचल प्रदेश में शिक्षा विभाग के सैकड़ों कर्मचारियों को अब वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है। प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद ऐसे शिक्षकों से लाखों रुपये की रिकवरी की जाएगी, जिन्हें नियमित कर्मचारी मानकर एरियर और अन्य वित्तीय लाभ दिए गए थे। शिक्षा विभाग के एलीमेंट्री शाखा के निदेशक ने बाकायदा आदेश जारी कर इन कर्मचारियों से पूर्व में जारी किए गए वित्तीय लाभ की वसूली के निर्देश दिए हैं। यह पत्र सभी जिला शिक्षा उपनिदेशकों और सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपलों को भेजा गया है।
क्यों हो रही है शिक्षकों से रिकवरी?
दरअसल, हिमाचल प्रदेश में 12 दिसंबर 2003 के बाद नियुक्त शिक्षकों को उनकी नियुक्ति तिथि से नियमित कर्मचारी मानने की मांग लंबे समय से चल रही थी। कई शिक्षकों ने इस मामले को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी नियुक्ति तिथि को ही उनकी सेवा का नियमितीकरण माना जाना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने शिक्षा विभाग के भर्ती एवं पदोन्नति नियमों के आधार पर शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाया। इस फैसले के आधार पर शिक्षा विभाग ने वित्त विभाग की मंजूरी से ऐसे शिक्षकों को बकाया एरियर और अन्य वित्तीय लाभ दे दिए थे। लेकिन अब विधि विभाग की सलाह पर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि 12 दिसंबर 2003 के बाद नियुक्त कोई भी कर्मचारी अपनी नियुक्ति की तिथि से नियमित नहीं माना जाएगा। ऐसे में, उन शिक्षकों से दी गई राशि की रिकवरी की जाएगी, जिन्होंने इस आधार पर वित्तीय लाभ प्राप्त किए थे।
शिक्षकों में बढ़ी नाराजगी, कोर्ट जाने की तैयारी
रिकवरी की खबर से एलीमेंट्री शिक्षा विभाग के सैकड़ों शिक्षकों में हड़कंप मच गया है। कई शिक्षक संगठनों ने इस फैसले का विरोध किया है और इसे अन्यायपूर्ण करार दिया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि सरकार ने पहले खुद वित्त विभाग की मंजूरी के बाद भुगतान किया था, अब अचानक शिक्षकों से पैसा वापस मांगना गलत है।
शिक्षकों की मांग है कि सरकार अपने फैसले को वापस ले, अन्यथा वे फिर से न्यायालय का रुख करेंगे। हिमाचल प्रदेश शिक्षक महासंघ और हिमाचल प्रदेश राजकीय अध्यापक संघ सहित कई संगठन सरकार से इस फैसले को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
कई साल तक अनुबंध पर रहे शिक्षक
शिक्षा विभाग में इस समय नियमों के तहत दो साल का अनुबंध पूरा करने के बाद शिक्षकों को नियमित किया जा रहा है। लेकिन पहले कई शिक्षक ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने आठ-आठ साल तक अनुबंध पर सेवाएं दीं और फिर उन्हें नियमित किया गया। इन शिक्षकों का कहना है कि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया को देखते हुए उन्हें नियुक्ति की तिथि से ही नियमित कर्मचारी का दर्जा मिलना चाहिए था।
विधि विभाग की राय के बाद बदला सरकार का रुख
इस मामले में सरकार ने शुरुआत में उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर शिक्षकों को लाभ दिए थे, लेकिन अब विधि विभाग से राय लेने के बाद सरकार ने अपना रुख बदल लिया है। सरकार का मानना है कि 2003 के बाद नियुक्त किसी भी कर्मचारी को नियमित कर्मचारी का दर्जा नियुक्ति तिथि से नहीं दिया जा सकता, बल्कि उन्हें नियमित होने की तिथि से ही लाभ मिलेंगे।
इस नई स्थिति के चलते अब जिन शिक्षकों ने वर्षों पहले मिले वित्तीय लाभ खर्च कर दिए हैं, वे आर्थिक संकट में आ सकते हैं। कई शिक्षक इस फैसले से बेहद नाराज हैं और अब अगला कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं।
सरकार के रुख पर नजर, शिक्षक फिर लड़ सकते हैं कानूनी लड़ाई
सरकार के इस फैसले को लेकर शिक्षकों में जबरदस्त असंतोष है। कई शिक्षक संगठन इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। इस मामले में आगे क्या होगा, यह देखना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि हिमाचल प्रदेश में शिक्षा विभाग के इस फैसले से शिक्षक समुदाय में रोष बढ़ता जा रहा है।